भोर

प्रकृति के अनेक अलिखित नियम है, उनमें से एक है सूर्योदय और सूर्यास्त. अनंत काल से अपने निश्चित समय पर सूरज देवता पदार्पण करते हैं और फिर दिन भर पृथ्वी को अपने प्रखर तेज़ से प्रकाशित कर, शाम होते होते अस्त हो जातें हैं . कहने को तो यह इतनी सामान्य घटना है कि, इसमें चर्चा करने जैसा कुछ है ही नहीं! सूर्योदय और सूर्यास्त , यह तो प्रतिदिन होता ही है!

बचपन से कुछ वर्ष पहले तक , हम ने इसे महत्व नहीं दिया. सुबह जल्दी उठना, सिर्फ़ morning school होने की मजबूरी थी. कॉलेज में पढ़ाई का pressure था . मुँह- अंधेरे हम उठ ज़ाया करते थे और पढ़ाई में तल्लीन हो ज़ाया करते थे. फिर जब बच्चे स्कूल जाने लगे तो सुबह टिफ़िन बनाने और उन्हें तैयार कर स्कूल भेजने का चक्कर होता.छुट्टियों में , सैर पर जाने पर , आराम से उठ कर अपनी थकान मिटाया करते थे. 

एक बार अपने doctors group के साथ मालदीव घूमने गए,तो हमारे एक मित्र ने कहा; कल मुझे सुबह सूर्योदय से पहले उठना है.उनकी यह बात सुन हम सोचने लगे, छुट्टियों में सुबह -सुबह कौन उठता है ? तड़के ही अपना camera और tripod ले कर वह समुद्र तट पर सूर्योदय की प्रतीक्षा करने लगे और फिर उन्होंने बहुत ही सुंदर तस्वीरें खींची । उन तस्वीरों को देखकर मन में कुछ कुतूहल हुआ. उनका   उत्साह और विलक्षण तस्वीरें हमारे लिए प्रेरणा साबित हुईं।

बच्चे जब बड़े हो गए तो हमनें भी morning walk के लिए समय निकाल लिया. मुंबई में रहने के कारण सूर्य देवता के दर्शन करने हमें प्रात: तड़के उठने की आवश्यकता नहीं होती. वो भी यहाँ आराम से पधारते हैं ! सूर्योदय से पहले ही तैयार हो ,हम मुँह अंधेरे निकल पड़ते हैं. Street lights अपनी रौशनी सड़कों पर फैलाते हैं, परंतु बाक़ी सारी दुनिया अंधेरे में होती है. फिर धीरे धीरे थोड़ा प्रकाश फ़ैलता है तो पेड़ पौधों की छाया- आकृति रेखांकित होती है. मंद मंद बयार बहने लगती है और पक्षियों के कलरव और चहचहाहट से वातावरण में एक स्फूर्ति सी जागृत हो जाती है. दूर क्षितिज पर कोई अदृश्य चित्रकार अपने पेंटिंग का सामान ले कर बैठ जाता है और काले -नीले आसमान को अपना कैनवास बना , रंगों की बौछार करता है. गुलाबी, बैंगनी, पीला, सुनहरा….. रंगबिंरगी छटाएँ बिखेर कर अलग अलग आकृतियों, अलग-अलग रूपों में उनको ढालता जाता है. 

अरुणोदय का यह नजारा प्रतिदिन विभिन्न होता है और रोमांचित करता है.फिर होता है सूर्योदय ! – सुर्ख़ लाल रंग का गोला धीमे धीमे क्षितिज से झांकने लगता है और कुछ ही क्षणों में पूर्ण रूप से दृष्टिगोचर होता है. इसके साथ ही वातावरण और भी सुंदर हो जाता है. सूर्य की रेशमी किरणें चारों ओर बिखर जाती हैं….. नदी, सागर  की सतह पर,  लहरों पर  खेलती चंचल परियों सी  सुंदर लगती हैं और  स्वर्णिम किरणों से आच्छादित   तरु की फुनगियाँ सुनहरे गुच्छों सी मालूम पड़ती हैं ….और यह किरणें हमारे चेहरों को शीतलता से सेंक देती हैं. 

धीरे-धीरे सूरज का रूप लाल से नारंगी-पीला होता जाता है और उसका तेज़ भी बढ़ते बढ़ते वातावरण की तपिश बढ़ाता है.  

अब तो हम जहां कहीं भी छुट्टियों में भी जाते हैं , सुबह जल्दी उठ कर सूरज देवता के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं.

दार्जिलिंग में सर्दियों में हम गए थे. हिम-आच्छादित   कांचनजंगा की चोटियों के पीछे से उगते हुए सूरज को देखने हमें चार दिन परिश्रम करना पड़ा! हर रोज़ बादलों की ओट में वह हमसे लुका छुपी करता और हम अरुणोदय के सुख से वंचित हो जाते. आख़िरकार, आख़िरी दिन उसने हम पर दया दिखाई और अपनी पूरी शान और सुंदरता से  बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों की चोटियों के पीछे से निकल कर हमें दर्शन दिए.

             मॉरीशस में  , समुद्र तट पर देखा – दूर,समुद्र और आकाश जहां एक से प्रतीत होते थे, वहीं एक हल्की सी लाली उभर कर आई और फिर अनेक रंगों में मिल कर क्षितिज पर होली खेली और सारा आसमान अनेक छटाओं से भर गया. 

जैसलमेर में भी हम मुँह अंधेरे मीलों फैले रेगिस्तान के छोर से उगते सूरज की सुंदरता की अनुभूति करने गए थे. 

बनारस में, तड़के उठ,हम गंगाजी में नाव में विहार करते  सूरज के उगने की प्रतीक्षा करते , वहाँ के अनगिनत घाटों के सौंदर्य एवं महत्व जान रहे थे।

वही सूरज, वही सूर्योदय परंतु हर जगह की छटा निराली, हर जगह का वातावरण भिन्न….

वृंदावन में मंगल आरती के उपरांत, परिक्रमा करने के लिए जाते समय वहाँ के सूर्योदय का आनंद अलग ही है! वृक्षों पर मोर बैठे रहते हैं और उनके पंखों पर किरणें छन छन कर आती हैं तो स्वर्ग-सुख कैसा होगा , इसकी झलक मिलती है ! वृंदावन में हमें अपना चश्मा सँभाल , चोरी चोरी से सूर्योदय देखना पड़ता है नहीं तो पेड़ों पर चढ़े बंदर अचानक आकर चश्मा झपट लेते हैं और चने खिलाने पर ही चश्मा वापस करते हैं. 

अभी भी हमें बहुत सी जगहों के सूर्योदय देखने हैं –  पूरी, रामेश्वरम, कन्या कुमारी….. 

इतना तो निश्चित है कि वहाँ भी हमें एक अलग ही अनुभूति होगी. 

फिर मिलेंगे….

स्मित 

8 thoughts on “भोर

  1. Suryodaya ka varnan bahut hi sundar shabdo mei vyakhya kiya hai tumne!! Smita .. Padh ke bahut achha laga 👌👌👌

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  2. Smita Suryoday ka anand hamne tumhari ankhon se liya…Itne saral shabdo me tumne hame hr jagah ki suryoday ki sundarta dikha di..Mann snigdh ho gaya…

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