मार्च का महीना .होली के बाद से ही मौसम में गर्मी दस्तक देने लगती है . घर की खिड़कियां, दरवाज़े बंद कर पंखा तेज़ी से चलाने का क्रम शुरू हो जाता है . दोपहर की नीरवता में तेज घुमते पंखे की आवाज़ बहुत कुछ याद दिलाती है …
मार्च अप्रैल के महीने में हमेशा परीक्षाएं होती थी . Preparation leave में दिन भर घर में रहना और पढ़ाई करना , यही दिनचर्या थी . दोपहर के खाने के बाद जब मम्मी आराम करती थी , तब तेज़ी से चलते हुए पंखे के नीचे बैठे, पढ़ने की कोशिश किया करते थे !
आज -कल ,दोपहर को घर में तेज़ चलते पंखे, उन दिनों की परेशानी , अनिश्चितता और तनावपूर्ण वातावरण की याद दिलाती है.
समय का चक्र है, अब हमारे बच्चे उस दौर से गुज़र रहे हैं . समझ नहीं आता कि वह दौर ज़्यादा कठिन था या फिर यह!!
छुट्टियां होने पर सामान पैक कर छुट्टियाँ मनाने घर जाने की ओढ़ रहती थी . आज कल रोज़ आते -जाते , लोगों को सामान लिए , अपने – अपने परिजनों की यहॉं जाने की उत्सुकता और बेचैनी देखती हूँ.
कुछ वर्षों पहले तक हम भी समय निकाल कर छुट्टी मनाने घर जाया करते थे .
बहुत साल हुए, जब 2 जोड़ी आँखें आतुरता से हमारे आने की राह देखती रहती थी. ट्रेन के सफ़र में भी अपने गंतव्य स्टेशन आने से काफ़ी देर पहले से ही दिल तेज़ी से धड़कने लगता था और मन बेचैन हो जाता था .
कुछ समय बाद दो जोडी आँखों से एक जोड़ी रह गई …. फिर भी उसकी आतुरता और आग्रह में कभी कोई कमी न थी . हमारे लिए कोई पलकें बिछाए बैठा है यह भावना ही कितनी अनमोल और आत्मविभोर करने वाली है
नियती के खेल देखिए …..अब वह एक जोड़ी आंखें भी नही रही ! समय यूँ ही कटता जाता है . मनुष्य अपने आपको हर परिस्थिति में ढाल लेता है ..
छुट्टियों में अब भी जाना होता है , कभी दूर , कभी पास ,
परंतु न जाने क्यों , ये छुट्टियाँ उन छुट्टियों सी नहीं हैं …
ऑटो रिक्शॉ में एक स्त्री अपने दोनों बच्चों के साथ , बैग लिए आतुरता से बैठते देख मन में एक टीस सी उठी….
जाते तो हम भी हैं घूमने पर अब कोई हमारी आतुरता से प्रतीक्षा नहीं करता है ! हमारी पसंद -नापसंद का ख़याल कर , बाहें पसारे हमारी बाट नहीं जोहता है! बहुत बड़ी क़ीमत देनी पड़ती है बड़े होने के लिए !!!
अब हम 2 जोड़ी आँखें , अपने बच्चों की राह देखते हैं ! और उनके लिए आंखें बिछाए रहते हैं !
समय का पहिया है चलता ही रहता है, चलता ही रहता है …..
स्मित
