Realisation

I stood on the seashore

Feet planted deep

Waves came lapping up

And washed the sand,

under my feet …

 I gazed at the dark deep blue expanse 

 stretched  in front of me 

 hiding fierce force ; Yet,

the waves played by 

gently along my feet……

Far away at the horizon 

darkness started dispelling 

Pink red and orange rays 

Spread their hues gleaming 

A magical wand waved  &

lifted the curtain of darkness 

the Sun rose majestically

and let its power harness 

Giant waves reached out 

to kiss the sky

the seagulls flapped their wings 

and got ready to fly 

Such surreal moment….

A chill ran down the spine 

the ambience so pristine 

struck a cord within 

In this infinite and perpetual universe 

how tiny and insignificant are we!

just like the shooting star 

our existence is momentary……

Let this reality soak in

  with all the bonds of 

desire & despair 

must we be free………

हौसला 

आँखों में उसके दृढ़ता छायी थी
शायद उसने एक गहरी चोट खाई थी
मूल्यों का यहाँ कोई मोल नहीं
ज़माने ने उसे यह तस्वीर दिखाई थी   

ज़िद थी उसकी अबकी ठन जाने दो 
औरों से जो बन न सकी बात
आज सबके सामने वह बात बन जाने दो 

है गुरुर उन्हें अपनों पर तो 
हमारे हौसलों का भी
इम्तहान हो जाने दो  

मुश्किल ही सही , नामुमकिन तो नहीं 
मंज़िल मिलेगी ज़रूर , देर से ही सही 
ज़रा खुल कर यह फ़ैसला भी हो जाने दो !!

स्मित 

गांधारी का श्राप

ज़िंदगी

अरुणोदय

भोर

प्रकृति के अनेक अलिखित नियम है, उनमें से एक है सूर्योदय और सूर्यास्त. अनंत काल से अपने निश्चित समय पर सूरज देवता पदार्पण करते हैं और फिर दिन भर पृथ्वी को अपने प्रखर तेज़ से प्रकाशित कर, शाम होते होते अस्त हो जातें हैं . कहने को तो यह इतनी सामान्य घटना है कि, इसमें चर्चा करने जैसा कुछ है ही नहीं! सूर्योदय और सूर्यास्त , यह तो प्रतिदिन होता ही है!

बचपन से कुछ वर्ष पहले तक , हम ने इसे महत्व नहीं दिया. सुबह जल्दी उठना, सिर्फ़ morning school होने की मजबूरी थी. कॉलेज में पढ़ाई का pressure था . मुँह- अंधेरे हम उठ ज़ाया करते थे और पढ़ाई में तल्लीन हो ज़ाया करते थे. फिर जब बच्चे स्कूल जाने लगे तो सुबह टिफ़िन बनाने और उन्हें तैयार कर स्कूल भेजने का चक्कर होता.छुट्टियों में , सैर पर जाने पर , आराम से उठ कर अपनी थकान मिटाया करते थे. 

एक बार अपने doctors group के साथ मालदीव घूमने गए,तो हमारे एक मित्र ने कहा; कल मुझे सुबह सूर्योदय से पहले उठना है.उनकी यह बात सुन हम सोचने लगे, छुट्टियों में सुबह -सुबह कौन उठता है ? तड़के ही अपना camera और tripod ले कर वह समुद्र तट पर सूर्योदय की प्रतीक्षा करने लगे और फिर उन्होंने बहुत ही सुंदर तस्वीरें खींची । उन तस्वीरों को देखकर मन में कुछ कुतूहल हुआ. उनका   उत्साह और विलक्षण तस्वीरें हमारे लिए प्रेरणा साबित हुईं।

बच्चे जब बड़े हो गए तो हमनें भी morning walk के लिए समय निकाल लिया. मुंबई में रहने के कारण सूर्य देवता के दर्शन करने हमें प्रात: तड़के उठने की आवश्यकता नहीं होती. वो भी यहाँ आराम से पधारते हैं ! सूर्योदय से पहले ही तैयार हो ,हम मुँह अंधेरे निकल पड़ते हैं. Street lights अपनी रौशनी सड़कों पर फैलाते हैं, परंतु बाक़ी सारी दुनिया अंधेरे में होती है. फिर धीरे धीरे थोड़ा प्रकाश फ़ैलता है तो पेड़ पौधों की छाया- आकृति रेखांकित होती है. मंद मंद बयार बहने लगती है और पक्षियों के कलरव और चहचहाहट से वातावरण में एक स्फूर्ति सी जागृत हो जाती है. दूर क्षितिज पर कोई अदृश्य चित्रकार अपने पेंटिंग का सामान ले कर बैठ जाता है और काले -नीले आसमान को अपना कैनवास बना , रंगों की बौछार करता है. गुलाबी, बैंगनी, पीला, सुनहरा….. रंगबिंरगी छटाएँ बिखेर कर अलग अलग आकृतियों, अलग-अलग रूपों में उनको ढालता जाता है. 

अरुणोदय का यह नजारा प्रतिदिन विभिन्न होता है और रोमांचित करता है.फिर होता है सूर्योदय ! – सुर्ख़ लाल रंग का गोला धीमे धीमे क्षितिज से झांकने लगता है और कुछ ही क्षणों में पूर्ण रूप से दृष्टिगोचर होता है. इसके साथ ही वातावरण और भी सुंदर हो जाता है. सूर्य की रेशमी किरणें चारों ओर बिखर जाती हैं….. नदी, सागर  की सतह पर,  लहरों पर  खेलती चंचल परियों सी  सुंदर लगती हैं और  स्वर्णिम किरणों से आच्छादित   तरु की फुनगियाँ सुनहरे गुच्छों सी मालूम पड़ती हैं ….और यह किरणें हमारे चेहरों को शीतलता से सेंक देती हैं. 

धीरे-धीरे सूरज का रूप लाल से नारंगी-पीला होता जाता है और उसका तेज़ भी बढ़ते बढ़ते वातावरण की तपिश बढ़ाता है.  

अब तो हम जहां कहीं भी छुट्टियों में भी जाते हैं , सुबह जल्दी उठ कर सूरज देवता के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं.

दार्जिलिंग में सर्दियों में हम गए थे. हिम-आच्छादित   कांचनजंगा की चोटियों के पीछे से उगते हुए सूरज को देखने हमें चार दिन परिश्रम करना पड़ा! हर रोज़ बादलों की ओट में वह हमसे लुका छुपी करता और हम अरुणोदय के सुख से वंचित हो जाते. आख़िरकार, आख़िरी दिन उसने हम पर दया दिखाई और अपनी पूरी शान और सुंदरता से  बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों की चोटियों के पीछे से निकल कर हमें दर्शन दिए.

             मॉरीशस में  , समुद्र तट पर देखा – दूर,समुद्र और आकाश जहां एक से प्रतीत होते थे, वहीं एक हल्की सी लाली उभर कर आई और फिर अनेक रंगों में मिल कर क्षितिज पर होली खेली और सारा आसमान अनेक छटाओं से भर गया. 

जैसलमेर में भी हम मुँह अंधेरे मीलों फैले रेगिस्तान के छोर से उगते सूरज की सुंदरता की अनुभूति करने गए थे. 

बनारस में, तड़के उठ,हम गंगाजी में नाव में विहार करते  सूरज के उगने की प्रतीक्षा करते , वहाँ के अनगिनत घाटों के सौंदर्य एवं महत्व जान रहे थे।

वही सूरज, वही सूर्योदय परंतु हर जगह की छटा निराली, हर जगह का वातावरण भिन्न….

वृंदावन में मंगल आरती के उपरांत, परिक्रमा करने के लिए जाते समय वहाँ के सूर्योदय का आनंद अलग ही है! वृक्षों पर मोर बैठे रहते हैं और उनके पंखों पर किरणें छन छन कर आती हैं तो स्वर्ग-सुख कैसा होगा , इसकी झलक मिलती है ! वृंदावन में हमें अपना चश्मा सँभाल , चोरी चोरी से सूर्योदय देखना पड़ता है नहीं तो पेड़ों पर चढ़े बंदर अचानक आकर चश्मा झपट लेते हैं और चने खिलाने पर ही चश्मा वापस करते हैं. 

अभी भी हमें बहुत सी जगहों के सूर्योदय देखने हैं –  पूरी, रामेश्वरम, कन्या कुमारी….. 

इतना तो निश्चित है कि वहाँ भी हमें एक अलग ही अनुभूति होगी. 

फिर मिलेंगे….

स्मित 

माँ

It has been 16 years , when you left us all alone…. cannot forget you for a single moment…

राह में आते जाते ,

कभी किसी वृद्ध महीला को देख ,

तुम्हारी छवि आँखों में आ जाती है माँ ……

बालों में चांदी , 

थोडे झुके से कंधे,

उम्र के बोझ से 

थकी थकी सी चाल …..

जानते हुए भी की वह तुम नही हो 

बरबस मुड के देख लेती हूँ ,

कहीं वह तुम तो नहीं माँ……

एक आभास सा होता है, 

तुमने आवाज़ दी है,

तुम मेरे आसपास ही हो ….

पर तुम यहाँ नहीं हो कर भी , 

मेरे पास ही हो मॉं …….

कैसे अलग कर पाऊंगी 

अपने अस्तित्व को तुमसे मैं 

तुम मुझ में ही तो समायी हो , है ना मॉं ?

जब कोमल थे पंख मेरे ,

जब कमजो़र थे हौसले मेरे 

तुमने ही तो बलशाली बनाया था ना मुझे मॉं….

खुद कमजो़र हो कर भी 

एक चट्टान की तरह , 

हमें आँधी तूफान से 

बचाया था ना तुमने मॉं…

कैसी अद्भुत शक्ति थीं तुम ,

कैसा मजबूत साया थीं तुम ,

अपनी कमज़ोर अवस्था में भी ,

कैसे हम सब का सहारा थीं तुम!!!!

कोई दिन नहीं बीतता , 

कोई घड़ी नहीं जाती 

जब तुम्हारी सिखायी कोई 

बात मुझे याद नहीं आती …..

लड़ती झगड़ती थी मैं 

हर बात पर तुमसे ,

रूठती और मुंह फुलाती थी ….

कभी प्यार से , कभी फटकार से 

हमेशा सही दिशा बताती थीं तुम….

हर मुसीबत में , 

हर कठिनाईं में 

हौले से , प्यार से , अपने साथ मुझे 

तरकर ले जाती थीं तुम…..

गुमसुम उदास आज भी हूं मैं 

जाने तुम कहॉं खोई हो ….

हमें यहॉं अकेला छोड़ कर 

जाने किस लोक में गुम हो गई हो तुम 

मॉं …. 

मुमकिन नहीं अब तुम्हें फिर से देख पाना 

फिर भी अपने होने का 

अहसास जतलाती रहो तुम   मॉं …. 

मुझे अभी भी बहुत याद आती हो तुम   

  मॉं……..

स्मित

मातृत्व

नवजात शिशु को जन्म के पश्चात, पहली बार अपनी गोद में लेते समय उस नईनवेली माँ की आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली … अश्रु सुख के थे, समाधान के थे, प्रसव वेदना के उपरांत थकान के थे , और सबसे ज़्यादा , जिस जीव से उसका नौ महीने का संबंध था , उसे प्रथमत: अपनी आँखों से देखने के असीम आनंद के थे ! यह एक अब तक की सबसे अलग , विस्मित कर देने वाली अनुभूति थी. 

नन्हे से शिशु के रुदन से वह पहले थोड़ी सी बेचैन ,फिर आश्वस्त हो गई, कि सब कुछ ठीक है. एक निश्चिंत, लापरवाह जीवन जीने की आदी , वह एक ही दिन में एक ज़िम्मेदार माँ बन गई ….. कैसा अद्भुत परिवर्तन हो जाता है!! वह जो रात को घोड़े बेच कर सोया करती थी , अब शिशु की एक छींक से जाग जाती है और शायद हमेशा के लिए उस निश्चिंत नींद को तिलांजलि दे देती है….

जैसे जैसे शिशु बड़ा होता जाता है, उसके व्यवहार में भी बदलाव आता जाता है. प्रेम, अनुराग, वात्सल्य, भय , क्रोध, शंका , सारे भाव समय समय पर उमड़ते रहते हैं .

वह एक गृहणी हो, बहु हो या फिर एक करियर वुमन , उसके जीवन का केंद्र बिंदु हमेशा उसका बालक ही होता है. 

कहते हैं कि माँ के ह्रदय की गहराई कोई नाप नहीं सकता !! वह एक अथाह सागर की भाँति होती है जिसमें प्रेम का तरंगें उठती रहती हैं. कभी-कभी वह रौद्र रूप भी ले लेती है , कभी कठोर भी बन जाती है, और कभी अपने बच्चों के हित के लिए  उनकी दृष्टि में निंद्य और दुष्ट भी बन जाती है, परन्तु अपने बच्चों का हित ही सर्वप्रथम रखती है. 

जैसे जैसे बालक बड़ा होता जाता है  माँ के प्रेम का स्वरूप भी बदलता जाता है, किन्तु हर समय केन्द्र बिंदु उनका हित ही होता है.

अपने ख़ुद पर हुए संस्कारों , अपने वातावरण और परिस्थितियों के अनुरूप वह अपने इस दायित्व को पूरा करने का प्रयास करती है. दुनिया का सबसे कठिन कार्य, अपने बच्चों को सही दिशा दिखाना, उन्हें एक स्वस्थ, ज़िम्मेदार और अच्छा मानव बनाना, यही उसका ध्येय होता है. सबसे आश्चर्य की बात यह है कि इस कार्य के लिये कोई भी operating manual नहीं मिलता …..

उसकी उम्र चाहे जो हो , सामाजिक दृष्टि से उसकी पद , प्रतिष्ठा, परिस्थिति जैसी भी हो, चाहे वह संपन्न अथवा गरीब परिवार से हो, एक माँ के मन की भावनाएँ अपने बच्चों के लिए सर्वत्र एक सी होतीं है! 

ममता, वात्सल्य और प्रेम… इन्हीं धागों से वह अपने बच्चों के भविष्य के सपने बुनती है….

                                                     स्मित 

समय का चक्र

 

मार्च का महीना .होली के बाद से ही मौसम में गर्मी दस्तक देने लगती है . घर की खिड़कियां, दरवाज़े बंद कर पंखा तेज़ी से चलाने का क्रम शुरू हो जाता है . दोपहर की नीरवता में तेज घुमते  पंखे की आवाज़ बहुत कुछ याद दिलाती है …

मार्च अप्रैल के महीने में हमेशा परीक्षाएं होती थी . Preparation leave में दिन भर घर में रहना और पढ़ाई करना , यही दिनचर्या थी . दोपहर के खाने के बाद जब मम्मी आराम करती थी , तब तेज़ी से चलते हुए पंखे के नीचे बैठे,  पढ़ने की कोशिश किया करते थे !

आज -कल ,दोपहर को घर में तेज़ चलते पंखे,  उन दिनों की परेशानी , अनिश्चितता और तनावपूर्ण वातावरण की याद दिलाती है.

समय का चक्र है,  अब हमारे बच्चे उस दौर से गुज़र रहे हैं . समझ नहीं आता कि वह दौर ज़्यादा कठिन था या फिर यह!!

छुट्टियां होने पर सामान पैक कर छुट्टियाँ मनाने घर जाने की ओढ़ रहती थी . आज कल रोज़ आते -जाते , लोगों को सामान लिए , अपने – अपने परिजनों की यहॉं जाने की उत्सुकता और बेचैनी देखती हूँ. 

 कुछ वर्षों पहले तक हम भी समय निकाल कर छुट्टी मनाने घर जाया करते थे . 

बहुत साल हुए,  जब 2 जोड़ी आँखें आतुरता से हमारे आने की राह देखती रहती थी.  ट्रेन के सफ़र में भी अपने गंतव्य स्टेशन आने से काफ़ी देर पहले से ही दिल तेज़ी से धड़कने  लगता था और मन बेचैन हो जाता था . 

कुछ समय बाद दो जोडी आँखों से एक जोड़ी रह गई …. फिर भी उसकी आतुरता और आग्रह में कभी कोई कमी न थी . हमारे लिए कोई पलकें  बिछाए बैठा है यह भावना ही कितनी अनमोल  और  आत्मविभोर करने वाली है 

नियती  के खेल देखिए …..अब वह एक जोड़ी आंखें भी नही रही ! समय यूँ ही कटता जाता है . मनुष्य अपने आपको हर परिस्थिति में ढाल  लेता है .. 

छुट्टियों में अब भी जाना होता है , कभी दूर , कभी पास , 

परंतु न जाने क्यों , ये छुट्टियाँ उन छुट्टियों सी नहीं हैं …

ऑटो रिक्शॉ में एक स्त्री अपने दोनों बच्चों के साथ , बैग लिए आतुरता से बैठते देख मन में एक टीस सी उठी….

जाते तो हम भी हैं घूमने पर अब कोई हमारी आतुरता से प्रतीक्षा नहीं करता है ! हमारी पसंद -नापसंद का ख़याल कर , बाहें पसारे हमारी बाट नहीं जोहता है!  बहुत बड़ी क़ीमत देनी पड़ती है बड़े होने के लिए !!!

अब हम 2 जोड़ी आँखें , अपने  बच्चों की राह देखते हैं ! और उनके लिए आंखें बिछाए रहते हैं !

समय का पहिया है चलता ही रहता है, चलता ही रहता है …..

                                                 स्मित