दूर प्राची के क्षितिज पर,
यह किसने बिखेरा है गुलाल!
नीले -नीले नभ पर ,कितना मोहक,
सुनहरा पीला और सिन्दूरी लाल !!
हिमाच्छादित शिखर के पीछे ,
हौले से झांका रवि ,
पल भर में फैला उजियाला ,
हुआ आँखों से ओझल शशि !!
स्वर्णिम किरणों ने होड़ लगायी ,
उज्ज्वल करने यह भूमि ,
सागर सरिता अम्बर धरती,
हुए आलोकित सारे
निशा की नीरवता दूर हुई !
तरु की फुनगी पर चिरैया ,
आखें मूँदे -मंद बयार में ,
हौले हौले डोलती !
स्वागत में बैठी रश्मि के ,
अपनी सखियों संग बोलती !
चलो उठो फिर उड़ने जाएँ ,
दूर क्षितिज की सीमा तरने!
त्तरणि के तेज़ से अपने ,
पंखों को बलशाली करने!
नूतन दिवस उजड़ा हैं सखियों
फिर एक नई उमंग है !
आओ हम सब गतिमान कर लें
यह जो जीवन तरंग है
अनमोल है यह जीवन ,
उपहार में मिला ,सार्थक करने को
अपनी क्षमता की पराकाष्ठा तोड़
विस्मित कर दे सृष्टि को !
